
हल्द्वानी : देहरादून में देर रात 12:30 बजे तक बार खुले मिलने की घटनाओं ने आबकारी विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश की राजधानी, जहां मुख्यमंत्री से लेकर तमाम बड़े अधिकारी मौजूद रहते हैं, वहीं यदि नियमों को खुलेआम धता बताकर शराब परोसी जा रही है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी शहरों में हालात कितने बदतर होंगे। प्रदेश में आबकारी नीति सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आ रही है। रेस्टोरेंट, ढाबे, सड़क किनारे खोमचे, शादी समारोह और निजी कार्यक्रमों में खुलेआम शराब परोसी जा रही है, लेकिन विभाग कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभाता दिख रहा है। सवाल यह है कि क्या आबकारी विभाग की जिम्मेदारी केवल छोटे-मोटे देसी पव्वे पकड़कर प्रेस नोट जारी करने तक सीमित रह गई है? हल्द्वानी में स्थिति और भी चिंताजनक बताई जा रही है। शहर के ढाबों, रेस्टोरेंटों, निजी आयोजनों और यहां तक कि सड़क किनारे ठेलों पर भी खुलेआम शराब परोसी जा रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों को सबकुछ पता होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जाती। इससे साफ संकेत मिलता है कि या तो विभाग पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं। शहर में शराब की कथित होम डिलीवरी का नेटवर्क भी तेजी से फैल रहा है। देर रात मोबाइल कॉल पर शराब उपलब्ध कराने की चर्चाएं आम हैं, लेकिन आबकारी विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं देती। इससे विभाग की कार्यप्रणाली और मंशा दोनों सवालों के घेरे में हैं। प्रदेश की जनता अब खुलकर सवाल उठाने लगी है कि आखिर आबकारी विभाग का अस्तित्व किस काम का है? लोगों के बीच यह चर्चा तक होने लगी है कि यदि विभाग नियमों का पालन नहीं करा पा रहा तो फिर विभाग को समाप्त कर खुली बिक्री की अनुमति ही दे दी जाए। उत्तराखंड राज्य आंदोलन इसलिए नहीं हुआ था कि शराब माफिया और बेलगाम अफसरशाही प्रदेश की व्यवस्था पर हावी हो जाए। लेकिन मौजूदा हालात यही संकेत दे रहे हैं कि जमीन पर कानून का डर खत्म होता जा रहा है और जिम्मेदार विभाग मौन साधे बैठा है।










