
दून नगर निगम एक बड़े विवाद के केंद्र में आ गया है, जहां सूत्रों के अनुसार 90 से ज्यादा भर्तियां नियमों को ताक पर रखकर की गई हैं, जिससे पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बताया जा रहा है कि इन नियुक्तियों में न तो कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई और न ही विधिवत विज्ञापन जारी किया गया, बल्कि अंदरखाने सेटिंग और सिफारिश के आधार पर लोगों को नौकरी दे दी गई। इस पूरे मामले ने उन हजारों योग्य युवाओं के अधिकारों पर सीधा प्रहार किया है, जो लंबे समय से वैध प्रक्रिया के जरिए नौकरी का इंतजार कर रहे थे। मामले को और गंभीर बनाता है भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (Article 14) का उल्लंघन, जो सभी नागरिकों को समानता और समान अवसर का अधिकार देता है। लेकिन यहां जिस तरह से भर्तियां की गई हैं, उसने इस संवैधानिक अधिकार को खुली चुनौती दे दी है। यह केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि कानून और व्यवस्था के प्रति लापरवाही का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है।

इसी बीच एक चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब एक महिला सामने आई और उसने दावा किया कि ये भर्तियां पूरी तरह से सिफारिश और अंदरूनी मिलीभगत के आधार पर की गई हैं। महिला के अनुसार योग्य उम्मीदवारों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया और कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए पूरी प्रक्रिया को मोड़ा गया। इस बयान के सामने आने के बाद मामला और ज्यादा तूल पकड़ता जा रहा है और लोगों के बीच आक्रोश साफ देखा जा सकता है।सबसे अहम बात यह है कि अब तक इस पूरे मामले पर कोई भी जिम्मेदार अधिकारी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है, जिससे शक और भी गहरा होता जा रहा है। प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है और पारदर्शिता पर गंभीर संदेह पैदा कर रही है। हालांकि उच्च स्तर से अब इन सभी भर्तियों को रद्द किए जाने की बात सामने आ रही है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि मामले की गंभीरता को समझते हुए बड़ी कार्रवाई की गई है। लेकिन इसके बावजूद यह सवाल बरकरार है कि आखिर इतनी बड़ी लापरवाही हुई कैसे और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब उच्च स्तरीय जांच की मांग तेज हो गई है। अगर ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह देहरादून नगर निगम के इतिहास का सबसे बड़ा भर्ती घोटाला साबित हो सकता है, जो आने वाले समय में कई बड़े खुलासों का कारण बन सकता है।
